ऋग्वेद 8.100.9
स॒मु॒द्रे अ॒न्तः श॑यत उ॒द्ना वज्रो॑ अ॒भीवृ॑तः ।भर॑न्त्यस्मै सं॒यत॑: पु॒रःप्र॑स्रवणा ब॒लिम्॥
samudre antaḥ śayata udnā vajro abhīvṛtaḥ |bharantyasmai saṃyata: puraḥprasravaṇā balim ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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