ऋग्वेद 8.18.15
पा॒क॒त्रा स्थ॑न देवा हृ॒त्सु जा॑नीथ॒ मर्त्य॑म् ।उप॑ द्व॒युं चाद्व॑युं च वसवः॥
pākatrā sthana devā hṛtsu jānītha martyam |upa dvayuṃ cādvayuṃ ca vasavaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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