ऋग्वेद 8.33.11
वृष॑णस्ते अ॒भीश॑वो॒ वृषा॒ कशा॑ हिर॒ण्ययी॑ ।वृषा॒ रथो॑ मघव॒न्वृष॑णा॒ हरी॒ वृषा॒ त्वं श॑तक्रतो॥
vṛṣaṇaste abhīśavo vṛṣā kaśā hiraṇyayī |vṛṣā ratho maghavanvṛṣaṇā harī vṛṣā tvaṃ śatakrato ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें