ऋग्वेद 8.33.12
वृषा॒ सोता॑ सुनोतु ते॒ वृष॑न्नृजीपि॒न्ना भ॑र ।वृषा॑ दधन्वे॒ वृष॑णं न॒दीष्वा तुभ्यं॑ स्थातर्हरीणाम्॥
vṛṣā sotā sunotu te vṛṣannṛjīpinnā bhara |vṛṣā dadhanve vṛṣaṇaṃ nadīṣvā tubhyaṃ sthātarharīṇām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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