ऋग्वेद 8.33.14
वह॑न्तु त्वा रथे॒ष्ठामा हर॑यो रथ॒युज॑: ।ति॒रश्चि॑द॒र्यं सव॑नानि वृत्रहन्न॒न्येषां॒ या श॑तक्रतो॥
vahantu tvā ratheṣṭhāmā harayo rathayuja: |tiraścidaryaṃ savanāni vṛtrahannanyeṣāṃ yā śatakrato ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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