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ऋग्वेद 8.43.8
जि॒ह्वाभि॒रह॒ नन्न॑मद॒र्चिषा॑ जञ्जणा॒भव॑न् ।अ॒ग्निर्वने॑षु रोचते॥
jihvābhiraha nannamadarciṣā jañjaṇābhavan |agnirvaneṣu rocate ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलेंजि॒ह्वाभि॒रह॒ नन्न॑मद॒र्चिषा॑ जञ्जणा॒भव॑न् ।अ॒ग्निर्वने॑षु रोचते॥
jihvābhiraha nannamadarciṣā jañjaṇābhavan |agnirvaneṣu rocate ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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