ऋग्वेद 8.47.15
नि॒ष्कं वा॑ घा कृ॒णव॑ते॒ स्रजं॑ वा दुहितर्दिवः ।त्रि॒ते दु॒ष्ष्वप्न्यं॒ सर्व॑मा॒प्त्ये परि॑ दद्मस्यने॒हसो॑ व ऊ॒तय॑: सु॒ऊतयो॑ व ऊ॒तय॑:॥
niṣkaṃ vā ghā kṛṇavate srajaṃ vā duhitardivaḥ |trite duṣṣvapnyaṃ sarvamāptye pari dadmasyanehaso va ūtaya: suūtayo va ūtaya: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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