ऋग्वेद 8.48.15
त्वं न॑: सोम वि॒श्वतो॑ वयो॒धास्त्वं स्व॒र्विदा वि॑शा नृ॒चक्षा॑: ।त्वं न॑ इन्द ऊ॒तिभि॑: स॒जोषा॑: पा॒हि प॒श्चाता॑दु॒त वा॑ पु॒रस्ता॑त्॥
tvaṃ na: soma viśvato vayodhāstvaṃ svarvidā viśā nṛcakṣā: |tvaṃ na inda ūtibhi: sajoṣā: pāhi paścātāduta vā purastāt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें