ऋग्वेद 8.53.6
आ॒जि॒तुरं॒ सत्प॑तिं वि॒श्वच॑र्षणिं कृ॒धि प्र॒जास्वाभ॑गम् ।प्र सू ति॑रा॒ शची॑भि॒र्ये त॑ उ॒क्थिन॒: क्रतुं॑ पुन॒त आ॑नु॒षक्॥
ājituraṃ satpatiṃ viśvacarṣaṇiṃ kṛdhi prajāsvābhagam |pra sū tirā śacībhirye ta ukthina: kratuṃ punata ānuṣak ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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