ऋग्वेद 8.61.7
त्वं ह्येहि॒ चेर॑वे वि॒दा भगं॒ वसु॑त्तये ।उद्वा॑वृषस्व मघव॒न्गवि॑ष्टय॒ उदि॒न्द्राश्व॑मिष्टये॥
tvaṃ hyehi cerave vidā bhagaṃ vasuttaye |udvāvṛṣasva maghavangaviṣṭaya udindrāśvamiṣṭaye ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें