ऋग्वेद 8.62.3
अहि॑तेन चि॒दर्व॑ता जी॒रदा॑नुः सिषासति ।प्र॒वाच्य॑मिन्द्र॒ तत्तव॑ वी॒र्या॑णि करिष्य॒तो भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तय॑:॥
ahitena cidarvatā jīradānuḥ siṣāsati |pravācyamindra tattava vīryāṇi kariṣyato bhadrā indrasya rātaya: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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