ऋग्वेद 8.70.15
क॒र्ण॒गृह्या॑ म॒घवा॑ शौरदे॒व्यो व॒त्सं न॑स्त्रि॒भ्य आन॑यत् ।अ॒जां सू॒रिर्न धात॑वे॥
karṇagṛhyā maghavā śauradevyo vatsaṃ nastribhya ānayat |ajāṃ sūrirna dhātave ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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