ऋग्वेद 9.100.5
क्रत्वे॒ दक्षा॑य नः कवे॒ पव॑स्व सोम॒ धार॑या ।इन्द्रा॑य॒ पात॑वे सु॒तो मि॒त्राय॒ वरु॑णाय च॥
kratve dakṣāya naḥ kave pavasva soma dhārayā |indrāya pātave suto mitrāya varuṇāya ca ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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