ऋग्वेद 9.101.13
प्र सु॑न्वा॒नस्यान्ध॑सो॒ मर्तो॒ न वृ॑त॒ तद्वच॑: ।अप॒ श्वान॑मरा॒धसं॑ ह॒ता म॒खं न भृग॑वः॥
pra sunvānasyāndhaso marto na vṛta tadvaca: |apa śvānamarādhasaṃ hatā makhaṃ na bhṛgavaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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