ऋग्वेद 9.104.2
समी॑ व॒त्सं न मा॒तृभि॑: सृ॒जता॑ गय॒साध॑नम् ।दे॒वा॒व्यं१ मद॑म॒भि द्विश॑वसम्॥
samī vatsaṃ na mātṛbhi: sṛjatā gayasādhanam |devāvyaṃ1 madamabhi dviśavasam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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