ऋग्वेद 9.106.11
धी॒भिर्हि॑न्वन्ति वा॒जिनं॒ वने॒ क्रीळ॑न्त॒मत्य॑विम् ।अ॒भि त्रि॑पृ॒ष्ठं म॒तय॒: सम॑स्वरन्॥
dhībhirhinvanti vājinaṃ vane krīḷantamatyavim |abhi tripṛṣṭhaṃ mataya: samasvaran ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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