ऋग्वेद 9.106.14अ॒या प॑वस्व देव॒युर्मधो॒र्धारा॑ असृक्षत ।रेभ॑न्प॒वित्रं॒ पर्ये॑षि वि॒श्वत॑:॥ayā pavasva devayurmadhordhārā asṛkṣata |rebhanpavitraṃ paryeṣi viśvata: ||इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें