वाल्मीकि रामायण 1.58.1
ततः संतप्त हृदयः स्मरन् निग्रहम् आत्मनः ।विनिःश्वस्य विनिःश्वस्य कृत वैरो महात्मना॥
tataḥ saṃtapta hṛdayaḥ smaran nigraham ātmanaḥ |viniḥśvasya viniḥśvasya kṛta vairo mahātmanā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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