वाल्मीकि रामायण 2.101.1
रामस्य वचनं श्रुत्वा भरत: प्रत्युवाच ह ।किं मे धर्माद्विहीनस्य राजधर्म: करिष्यति॥
rāmasya vacanaṃ śrutvā bharata: pratyuvāca ha |kiṃ me dharmādvihīnasya rājadharma: kariṣyati ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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