वाल्मीकि रामायण 2.111.29
अपधिर्न मया कार्य्यो वनवासे जुगुप्सित: ।युक्तमुक्तं च कैकेय्या पित्रा मे सुकृतं कृतम्॥
apadhirna mayā kāryyo vanavāse jugupsita: |yuktamuktaṃ ca kaikeyyā pitrā me sukṛtaṃ kṛtam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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