वाल्मीकि रामायण 2.113.1
तत: शिरसि कृत्वा तु पादुके भरतस्तदा ।आरुरोह रथं हृष्ट: शत्रुघ्नेन समन्वित:॥
tata: śirasi kṛtvā tu pāduke bharatastadā |āruroha rathaṃ hṛṣṭa: śatrughnena samanvita: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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