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वाल्मीकि रामायण 2.23.8
सन्ति धर्म उपधाः श्लक्ष्णा धर्मात्मन् किम् न बुध्यसे॥
santi dharma upadhāḥ ślakṣṇā dharmātman kim na budhyase ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलेंसन्ति धर्म उपधाः श्लक्ष्णा धर्मात्मन् किम् न बुध्यसे॥
santi dharma upadhāḥ ślakṣṇā dharmātman kim na budhyase ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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