वाल्मीकि रामायण 2.42.1
यावत् तु निर्यतः तस्य रजो रूपम् अदृश्यत ।न एव इक्ष्वाकु वरः तावत् सम्जहार आत्म चक्षुषी॥
yāvat tu niryataḥ tasya rajo rūpam adṛśyata |na eva ikṣvāku varaḥ tāvat samjahāra ātma cakṣuṣī ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें