वाल्मीकि रामायण 2.50.5
अनुक्रोशो दया चैव यथार्हम् मयि वह् कृतः ।चिरम् दुःखस्य पापीयो गम्यतामर्थसिद्धये॥
anukrośo dayā caiva yathārham mayi vah kṛtaḥ |ciram duḥkhasya pāpīyo gamyatāmarthasiddhaye ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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