वाल्मीकि रामायण 2.79.5
राज्यम् गृहाण भरत पितृ पैतामहम् महत् ।अभिषेचय च आत्मानम् पाहि च अस्मान् नर ऋषभ॥
rājyam gṛhāṇa bharata pitṛ paitāmaham mahat |abhiṣecaya ca ātmānam pāhi ca asmān nara ṛṣabha ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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