वाल्मीकि रामायण 3.21.18
अपयाहि जन स्थानात् त्वरितः सह बान्धवः ।जहि त्वम् समरे मूढान् यथा तु कुलपांसन॥
apayāhi jana sthānāt tvaritaḥ saha bāndhavaḥ |jahi tvam samare mūḍhān yathā tu kulapāṃsana ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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