वाल्मीकि रामायण 3.22.8
चतुर्दश सहस्राणि मम चित्त अनुवर्तिनाम् ।रक्षसाम् भीम वेगानाम् समरेषु अनिवर्तिनाम्॥
caturdaśa sahasrāṇi mama citta anuvartinām |rakṣasām bhīma vegānām samareṣu anivartinām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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