वाल्मीकि रामायण 3.31.1
त्वरमणः ततो गत्वा जनस्थानात् अकंपनः ।प्रविश्य लंकाम् वेगेन रावणम् वाक्यम् अब्रवीत्॥
tvaramaṇaḥ tato gatvā janasthānāt akaṃpanaḥ |praviśya laṃkām vegena rāvaṇam vākyam abravīt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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