Loading
वाल्मीकि रामायण 3.31.47
असौ रण अन्तः स्थिति संधि वालःविदग्ध रक्षो मृग हा नृसिंहः ।सुप्तः त्वया बोधयितुम् न शक्यःशारांग पुर्णो निशित असि दंष्ट्Rअः॥
asau raṇa antaḥ sthiti saṃdhi vālaḥvidagdha rakṣo mṛga hā nṛsiṃhaḥ |suptaḥ tvayā bodhayitum na śakyaḥśārāṃga purṇo niśita asi daṃṣṭRaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें