वाल्मीकि रामायण 3.43.48
यावत् गच्छामि सौमित्रे मृगम् आनयितुम् द्रुतम् ।पश्य लक्ष्मण वैदेहीम् मृग त्वचि गताम् स्पृहाम्॥
yāvat gacchāmi saumitre mṛgam ānayitum drutam |paśya lakṣmaṇa vaidehīm mṛga tvaci gatām spṛhām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें