वाल्मीकि रामायण 3.43.50
यावत् पृषतम् एकेन सायकेन निहन्मि अहम् ।हत्वा एतत् चर्म च आदाय शीघ्रम् एष्यामि लक्ष्मण॥
yāvat pṛṣatam ekena sāyakena nihanmi aham |hatvā etat carma ca ādāya śīghram eṣyāmi lakṣmaṇa ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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