वाल्मीकि रामायण 3.47.27
त्वाम् तु कांचन वर्ण आभाम् दृष्ट्वा कौशेय वासिनीम् ।रतिम् स्वकेषु दारेषु न अधिगच्छामि अनिन्दिते॥
tvām tu kāṃcana varṇa ābhām dṛṣṭvā kauśeya vāsinīm |ratim svakeṣu dāreṣu na adhigacchāmi anindite ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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