वाल्मीकि रामायण 4.24.11
द्रुम शाका अवभग्नो अहम् मुहुर्तम् परिनिष्टनन् ।स्वान्तयित्वा अनेन उक्तः न पुनः कर्तुम् अर्हसि॥
druma śākā avabhagno aham muhurtam pariniṣṭanan |svāntayitvā anena uktaḥ na punaḥ kartum arhasi ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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