वाल्मीकि रामायण 4.28.2
अयम् स कालः संप्राप्तः समयो अद्य जल आगमः ।संपश्य त्वम् नभो मेघैः संवृतम् गिरि संनिभैः॥
ayam sa kālaḥ saṃprāptaḥ samayo adya jala āgamaḥ |saṃpaśya tvam nabho meghaiḥ saṃvṛtam giri saṃnibhaiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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