वाल्मीकि रामायण 4.32.3
न मे दुर् व्याहृतम् किंचित् न अपि मे दुर् अनुष्ठितम् ।लक्ष्मणो राघव भ्राता क्रुद्धः किम् इति चिंतये॥
na me dur vyāhṛtam kiṃcit na api me dur anuṣṭhitam |lakṣmaṇo rāghava bhrātā kruddhaḥ kim iti ciṃtaye ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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