वाल्मीकि रामायण 4.46.23
तत्र वासः सुखो अस्माकम् निर्उद्विग्नो भविष्यति ।ततः पर्वतम् आसाद्य ऋश्यमूकम् नृपात्मज॥
tatra vāsaḥ sukho asmākam nirudvigno bhaviṣyati |tataḥ parvatam āsādya ṛśyamūkam nṛpātmaja ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें