वाल्मीकि रामायण 4.58.11
ततो अब्रवीत् महातेजा भ्राता ज्येष्ठो जटायुषः ।आत्म अनुरूपम् वचनम् वानरान् संप्रहर्षयन्॥
tato abravīt mahātejā bhrātā jyeṣṭho jaṭāyuṣaḥ |ātma anurūpam vacanam vānarān saṃpraharṣayan ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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