वाल्मीकि रामायण 5.22.10
तामभिक्रम्य संरब्धा वेपमानां समन्ततः ।भृशं संलिलिहुर्दीप्तान्प्रलम्बदशनच्छदान्॥
tāmabhikramya saṃrabdhā vepamānāṃ samantataḥ |bhṛśaṃ saṃlilihurdīptānpralambadaśanacchadān ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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