वाल्मीकि रामायण 5.22.18
रावणं भज भर्तारं भर्तारं सर्वरक्षसाम् ।विक्रान्तं रूपवन्तं च सुरेशमिव वासवम्॥
rāvaṇaṃ bhaja bhartāraṃ bhartāraṃ sarvarakṣasām |vikrāntaṃ rūpavantaṃ ca sureśamiva vāsavam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें