वाल्मीकि रामायण 5.35.87
हनुमन्तं कपिं व्यक्तं मन्यते नान्यथेति सा ।अथोवाच हनूमांस्तामुत्तरं प्रियदर्शनाम्॥
hanumantaṃ kapiṃ vyaktaṃ manyate nānyatheti sā |athovāca hanūmāṃstāmuttaraṃ priyadarśanām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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