वाल्मीकि रामायण 5.45.16
स्रवता रुधिरेणाथस्रवन्त्यो दर्शिताः पथि ।विविधैश्च स्वरैर्लङ्का ननाद विकृतं तदा॥
sravatā rudhireṇāthasravantyo darśitāḥ pathi |vividhaiśca svarairlaṅkā nanāda vikṛtaṃ tadā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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