वाल्मीकि रामायण 5.63.27
प्रीतो ऽस्मि सो ऽहं युद्भुक्तं वनं तैः कृतकर्मभिः ।मर्षितं मर्षणीयं च चेष्टितं कृतकर्मणाम्॥
prīto 'smi so 'haṃ yudbhuktaṃ vanaṃ taiḥ kṛtakarmabhiḥ |marṣitaṃ marṣaṇīyaṃ ca ceṣṭitaṃ kṛtakarmaṇām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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