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वाल्मीकि रामायण 5.8.3
न तत्र किम्चिन्न कृतम् प्रयत्नतो ।न तत्र किम्चिन्न महर्हरत्नवत् ।न ते विशेषा नियताः सुरेष्वपि ।न तत्र किम्चिन्न महाविशेषवत्॥
na tatra kimcinna kṛtam prayatnato |na tatra kimcinna maharharatnavat |na te viśeṣā niyatāḥ sureṣvapi |na tatra kimcinna mahāviśeṣavat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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