वाल्मीकि रामायण 6.12.6
प्रहस्तस्य वचः श्रुत्वा राजा राज्यहितैषिणः ।सुखेप्सुः सुहृदाम् मध्ये व्याजहार स रावणः॥
prahastasya vacaḥ śrutvā rājā rājyahitaiṣiṇaḥ |sukhepsuḥ suhṛdām madhye vyājahāra sa rāvaṇaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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