वाल्मीकि रामायण 6.3.3
कति दुर्गाणि दुर्गाया लंकायास् तद् ब्रवीहि मे ।ज्ञातुम् इच्चामि तत् सर्वम् दर्शनाद् इव वानर॥
kati durgāṇi durgāyā laṃkāyās tad bravīhi me |jñātum iccāmi tat sarvam darśanād iva vānara ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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