वाल्मीकि रामायण 6.30.32
श्वेतो ज्योतिर् मुखः च अत्र भास्करस्य आत्म सम्भवौ ।वरुणस्य च पुत्रो अथ हेम कूटः प्लवम् गमः॥
śveto jyotir mukhaḥ ca atra bhāskarasya ātma sambhavau |varuṇasya ca putro atha hema kūṭaḥ plavam gamaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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