वाल्मीकि रामायण 6.30.6
न अपि सम्भाषितुम् शक्याः सम्प्रश्नो अत्र न लभ्यते ।सर्वतो रक्ष्यते पन्था वानरैः पर्वत उपमैः॥
na api sambhāṣitum śakyāḥ sampraśno atra na labhyate |sarvato rakṣyate panthā vānaraiḥ parvata upamaiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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