वाल्मीकि रामायण 6.32.7
सा मुहूर्तात् समाश्वस्य प्रतिलभ्य च चेतनाम् ।तत् शिरह् समुपाघ्राय विललाप आयत ईक्षणा॥
sā muhūrtāt samāśvasya pratilabhya ca cetanām |tat śirah samupāghrāya vilalāpa āyata īkṣaṇā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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