वाल्मीकि रामायण 6.35.4
जगत्पम्तापनः क्रूरोगर्हयन् राक्षसेश्वरः ।तरणम् सागरस्य अपि विक्रमम् बल सम्चयम्॥
jagatpamtāpanaḥ krūrogarhayan rākṣaseśvaraḥ |taraṇam sāgarasya api vikramam bala samcayam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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