वाल्मीकि रामायण 6.43.2
ते हयैः काञ्चनापीडैर्ध्वजैश्चाग्निशिखोपमैः ।रथैश्चादित्यसङ्काशैः कवचैश्च मनोरमैः॥
te hayaiḥ kāñcanāpīḍairdhvajaiścāgniśikhopamaiḥ |rathaiścādityasaṅkāśaiḥ kavacaiśca manoramaiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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